असम सरकार ने दिए अडानी को 3000 बीघे जमीन तोहफे में 

एक वीडियो जो पिछले 2 दिनों से लगातार सुर्खियों में रहा है और जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है वह वीडियो है गुवाहाटी उच्च न्यायालय का। जहां न्यायमूर्ति संजय कुमार मोदी ने एक सुनवाई के दौरान दीमा हंसाओ जिले के सीमेंट परियोजना के बारे में अपना आश्चर्य व्यक्त किया। न्यायमूर्ति ने आश्चर्य भरे शब्दों में यह पूछा कि “एक सीमेंट परियोजना के लिए 3000 बीघे की भूमि का आवंटन किया गया है।” न्यायमूर्ति ने अपने आश्चर्य को विराम देते हुए भूमि की प्रकृति के बारे में भी चर्चा की और यह उजागर किया कि यह छठी अनुसूची के क्षेत्राधिकार में आने वाली भूमि है और अधिकारियों को इस अनुदान के पीछे की नीति/रिकॉर्ड को उजागर करना चाहिए। 

हालांकि इस मामले में आगे क्या होता है ये अलग सवाल है पर सरकार ने इस परियोजना के पक्ष में अपनी बात रखते हुए कहा है कि उन्होंने जरूरी सारे क्लियरेंस पर्यावरण मंत्रालय और “इंपैक्ट असेसमेंट” पहले ही करवा लिए हैं और सारे नियमों से गुजरने के बाद ही उन्हें यह मंजूरी मिली है। बहरहाल, भारत में ‘विकास‘ के लिए की जा रही परियोजनाओं के नाम पर “पर्यावरण प्रभाव आकलन ” का लगभग सत प्रतिशत रिकॉर्ड रहा है, और ज्यादातर मामलों में इन्हें मंजूरी मिल ही जाती है। 

इस मामले के साथ ही पूरे देश में एक नया विवाद भी खड़ा हुआ कि इतना बड़ा आवंटन अडानी ग्रुप्स एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर को सौंपा गया है। खैर इसका खंडन कई मीडिया ने कर दिया है जिसकी पुष्टि अन्य सूत्रों द्वारा भी की गई। अडानी ग्रुप्स ने बाजाप्ता एक स्पष्टीकरण पत्र के द्वारा पूरे देश को यह बताने की कोशिश की कि महाबल सीमेंट प्राइवेट लिमिटेड, जिस कंपनी को वास्तव में यह आवंटन मिला है, का उनकी कंपनी से कोई लेना देना नहीं है। वैसे एक बड़ी बात जिस पर आगे भी चर्चा होगी और होनी भी चाहिए, वह यह है कि क्या कंपनी महज 3 साल और 1 महीने पुरानी है।

इसके अलावा इनकी वेबसाइट पर दिए गए आंकड़े यह बताते हैं कि इस कंपनी का शेयर कैपिटल महज 10 लाख रुपए है और पेडअप कैपिटल महज 102000 रुपए है। इतने भारी भरकम प्रोजेक्ट के लिए क्या यह कंपनी स्वयं में पर्याप्त है, यह एक बड़ा सवाल है, न्यायालय को भी इस बात पर ज़रूर ध्यान देना चाहिए। दूसरा सबसे बड़ा सवाल यह है कि असम में जिस तरीके से छठी अनुसूची की जमीनों का आवंटन हो रहा है और आत्मनिर्भर होने की बात की जा रही है यह किस सीमा तक सच है। सरकार की बात मानें तो यह पूरा क्षेत्र बंजर है। पर क्या यह सच है? 

तथ्यों और आंकड़ों की मानें तो इसी क्षेत्र में जिन कंपनियों को महाबार सीमेंट प्राइवेट लिमिटेड से पहले आवंटन किए गए हैं वे भारी स्थानीय प्रतिरोध का सामना कर रहे हैं। इन प्रोजेक्ट्स से भारी संख्या में पलायन की स्थिति उत्पन्न हो गई है। जी हां इसी क्षेत्र में अडानी ग्रुप्स के अंबुजा सीमेंट को लगभग 1200 बीघा जमीन का आवंटन जब सरकार ने किया था तब से लेकर आज तक वहां के लोग इसका व्यापक प्रतिरोध करते आए हैं। 

दीमा हंसाओ का क्षेत्र प्रवासी पक्षियों के आने का एक बड़ा स्पॉट है और वहां के स्थानीय लोगों का मानना है कि बड़ी कंपनियों ने दीमा हंसाओ स्वायत्त समिति से जो करारनामा हासिल किया है वह वास्तव में विधि की सम्यक प्रक्रिया का उल्लंघन है। बड़ी विचित्र बात है, लोग जिन आदिवासियों को मूर्ख और पिछड़ा बता रहे हैं वह भारतीय संविधान की मूल आत्मा से गुजरते हुए सीधा सवाल कर रहा है कि “विधि की सम्यक प्रक्रिया कहां है? 

और विधि द्वारा स्थापित ‘अपवाद‘ का सामान्यीकरण वास्तविकता में लोकतांत्रिक व्यवस्था को झकझोर रहा है”। मेरी समझ से इतनी समझदारी रखने के लिए इन्हें किसी खास किताब का ज्ञाता बनने की जरूरत ही नहीं पड़ी वह अपनी परिस्थितियों का सही अध्ययन करके सीख गए। 

इससे पूर्व भी एक समाचार काफी कम सुर्खियां बटोरे बिना ही असम से गायब कर दिया गया था वह था पॉम ऑयल की खेती हेतु असम की जमीन का आवंटन गोदरेज एग्रोवेट और पतंजलि फूड लिमिटेड को किया गया था। इन जमीनों का आवंटन सरकार द्वारा चलाई जा रही नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल – ऑयल पॉम, के अंतर्गत किया गया था और आंकड़ों की मानें तो दोनों कंपनियों को कुल मिला कर लगभग 94000 हेक्टेयर से ज्यादा भूमि दी गई थी। 

पूरे देश में यह प्रचार किया गया कि पॉम ऑयल बेहद ही सुलभ और स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। और इसका एक बड़ा दुष्परिणाम जो हमारे सामने है वह यह है कि भारत की सरसों तेल की आत्मनिर्भरता खासी कमजोर हुई है या यूं कहें कि हम आज के समय में सरसों तेल के शुद्ध आयातक देश बन चुके हैं। 

यह वही पॉम ऑयल है जो इन वादों के साथ पूरे यूरोप में चल गया था कि यह न केवल खाने में ट्रांस फैट को कम करता है अपितु स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है। 2016 में यूरोपियन फूड सेफ्टी अथॉरिटी ने एक रिपोर्ट जारी करते हुए यह बताया कि पॉम ऑयल के प्रोसेसिंग में भरी तापमान के अंदर कैंसरकारी पदार्थ ग्लाइसीडिल ईस्टर्स बनता है। 

इसके बाद से लगातार यूरोप में इस तेल की मांग गिरने लगी। जो यूरोप 2013–14 में 6.8 मिलियन टन के आस पास पॉम ऑयल का उपभोग कर रहा था वह 2024 तक आते हुए 3.85 मिलियन टन तक सिमट गया है। आज के समय की वास्तविकता यह है कि वहां पॉम ऑयल का उपयोग बायोफुएल उत्पादन में ज्यादा है न कि खाद्य में। परंतु विडंबना तो यह है कि भारत में उसे ऐसे बेचा जा रहा है कि जैसे वह भविष्य में खाद्य तेल का सही विकल्प है। 

बहरहाल मुद्दा उच्च न्यायालय में निलंबित है और न्यायालय इस मामले पर संज्ञान ले रहा है। परंतु मैं यह बोलते हुए खुद को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी वाय चंद्रचूड़ से अलग करूंगा कि अगर देश किसी खास प्रकार की अर्थव्यवस्था से नहीं बंधा है तो देश के न्यायाधीश भी जनता के कल्याण को सर्वोपरि मानकर चलें और उसके आधार पर अर्थतंत्र को तय करें क्योंकि हर समय का परिवर्तन एक दिशा के अभाव में नहीं होता है। और वही दिशा राजनीतिक अर्थशास्त्र द्वारा तय होती है।

(निशांत आनंद पेशे से एडवोकेट हैं और लेखन का भी काम करते हैं।) 

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